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Thursday, March 1, 2012

मोहब्बत करने लगा हूँ

उनसे नफ़रत करने चला था मैं, अब खुद से ही नफ़रत करने लगा हूँ
मोहब्बत न करने की कसम खायी थी जिससे, उसी से मोहब्बत करने लगा हूँ
मिलते न थे मेरे ख्याल जिससे, उसी की वकालत करने लगा हूँ
खुदा को मैं न मानता था अभी तक, अब उसी की इबादत करने लगा हूँ


दिल के आगे किसी का जोर कभी चलता नहीं, 
सही और गलत से परे, कुछ ऐसे ख्याल करने लगा हूँ

पहले तो झगड़ो में भी गुस्सा न आता था
और अब हर छोटी सी बात पर, बवाल करने लगा हूँ

हल पल एक बेचैनी, एक खुमार सा रहता है
क्यूँ होता है ऐसा, खुद से ही सवाल करने लगा हूँ

गर उनसे कह दूँ तो दोस्ती टूट सकती है
इसलिए न कह कर , इस दिल को हलाल करने लगा हूँ 


शायद उनसे दूर हो जाऊं तो चैन मिले
पर चैन कहा है, उसकी तलाश करने लगा हूँ

चैन को भी शायद उनसे ही मुहब्बत है
चैन भी उनके ही पास मिलता है, ऐसे कयास करने लगा हूँ

दूर होने की फिराक में और करीब हो रहा हूँ
खुद से दूर होकर भी देख लिया जाए,ऐसे प्रयास करने लगा हूँ 

कभी तो उनको मेरी हालत पे तरस आये
उन आँखों में भी प्यार की कुछ बूदें हो,ऐसी आस करने लगा हूँ 
------------------------------------------------------------------------------विपिन 

Monday, February 13, 2012

मुहब्बत

बसंत ऋतु को प्यार का समय माना जाता है ...जब बंजर दिल में भी प्रेम-पुष्प  खिल जाता है ...और प्रकृति भी मानो इसको बढ़ावा देती है ...ऐसा खूबसूरत समां बंधता है कि कोई भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रह पता ....
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मुहब्बत बड़ी हसीन होती है, दिल का चैन चुरा लेती है
याद रहती है एक ही छवि, और खुद को भुला देती है
जितनी कोशिश चाहे कर लो, भूलने न देती है 
ये वो दर्द है, जो चुभती है, पर मज़ा देती है

लगती है हर बात भली, हर अदा सुहानी लगती है
हर पल इक कविता, हर क्षण, नयी कहानी लगती है 
कभी-कभी कौवे सी कर्कश, कभी कोयल की बानी लगती है 
पल में तो बच्ची के जैसी, पल में एक सयानी लगती है 

कहता है इक टूटा आशिक, दर्द बहुत है सीने में
दर्द न हो गर इस जीवन में तो, ख़ाक मज़ा है जीने में
कहता है इक दीवाना कि,  है नशा बहुत कमीने में
नशा न हो गर मदिरा में तो, ख़ाक मज़ा है पीने में
-----------------------------------------------------------विपिन(१४/०२/२०१२)
(आखिरी paragraph कि पहली २ पंक्तियाँ  मेरे पसंदीदा गाने से ली गयी है...थोड़ी सी बदली जरूर हैं पर बात वही है)