Tuesday, September 29, 2015

ख़ुशी

एक अधूरी रचना !

आज बहुत खुश हुआ तो एक ख्याल आया, ख़ुशी क्या होती है ?

गहन सोच विचार के बाद एक उपाय सूझा की शायद थोडा और सोचने पर कुछ संछिप्त और तार्किक परिभाषा बना सकूँ ... पर ज्यों ज्यों सोचता गया त्यों त्यों मामला और उलझता गया !!

एक विचार तो आया कि ... जिस क्षण में जीवन जीने में आनंद कि अनुभूति हो वो ख़ुशी है ..
उस क्षण सब कुछ अच्छा प्रतीत होता है ... एक उमंग सा महसूस होता है ...
दोस्तों के साथ कुछ पल सड़क के किनारे आइसक्रीम खाना, और इधर उधर कि बकवास करना भी एक अलग ही तरह कि ख़ुशी है ...
यूँ तो दार्शनिक दृष्टिकोण से ऊपर लिखी बात में कुछ भी ठोस तत्व नहीं नज़र आता... पर अनुभूति शुरू ही वहां से होती है जहा दार्शनिक दृष्टिकोण समाप्त होता है ..

इसलिए तो किसी भी अनुभूति को शब्दों कि सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता !

मैं भी कहाँ दार्शनिक दृष्टिकोण  के जाल उलझ गया :P

फिर और सोचा तो एक विचार ये भी आया कि ख़ुशी कब और किस बात पर, कितनी होगी इसका कोई मापदंड नहीं है ..
जितना १०० रु पाने  में ख़ुशी नहीं मिलती तो वही १०० रु भी अगर किसी जरूरतमंद को दिए जाए तो अपार ख़ुशी का अनुभव होता है। ....


Thursday, March 1, 2012

मोहब्बत करने लगा हूँ

उनसे नफ़रत करने चला था मैं, अब खुद से ही नफ़रत करने लगा हूँ
मोहब्बत न करने की कसम खायी थी जिससे, उसी से मोहब्बत करने लगा हूँ
मिलते न थे मेरे ख्याल जिससे, उसी की वकालत करने लगा हूँ
खुदा को मैं न मानता था अभी तक, अब उसी की इबादत करने लगा हूँ


दिल के आगे किसी का जोर कभी चलता नहीं, 
सही और गलत से परे, कुछ ऐसे ख्याल करने लगा हूँ

पहले तो झगड़ो में भी गुस्सा न आता था
और अब हर छोटी सी बात पर, बवाल करने लगा हूँ

हल पल एक बेचैनी, एक खुमार सा रहता है
क्यूँ होता है ऐसा, खुद से ही सवाल करने लगा हूँ

गर उनसे कह दूँ तो दोस्ती टूट सकती है
इसलिए न कह कर , इस दिल को हलाल करने लगा हूँ 


शायद उनसे दूर हो जाऊं तो चैन मिले
पर चैन कहा है, उसकी तलाश करने लगा हूँ

चैन को भी शायद उनसे ही मुहब्बत है
चैन भी उनके ही पास मिलता है, ऐसे कयास करने लगा हूँ

दूर होने की फिराक में और करीब हो रहा हूँ
खुद से दूर होकर भी देख लिया जाए,ऐसे प्रयास करने लगा हूँ 

कभी तो उनको मेरी हालत पे तरस आये
उन आँखों में भी प्यार की कुछ बूदें हो,ऐसी आस करने लगा हूँ 
------------------------------------------------------------------------------विपिन 

Wednesday, February 29, 2012

शेर

यूँ तो करते रहे वो हमसे नफ़रत उम्र भर ....
पर रह न सके वो इक पल भी हमारे बिना !! -विपिन  

Tuesday, February 28, 2012

आज मैंने चाँद देखा !!

आज मैंने चाँद देखा ..

यूँ तो रोज़ ही देखते हैं ..पर आज टेलीस्कोप से देखा ..तो पता चला चाँद पर दाग तो हैं.. 

पर वही उसको और खूबसूरत बनाते हैं ..


थोड़ी सी कमी ही सम्पूर्णता की तलब बढाती है ... 

और खूबसूरत होने का एहसास दिलाती है ..


ये मुझे तब पता चला जब ... 

आज मैंने चाँद देखा !!  


---------------------------------------------------------------------------विपिन 


(इनफ़ोसिस की ओर से तरह तरह के तारों और ग्रहों को देखने के लिए टेलीस्कोप का इंतज़ाम किया गया था 


...और चाँद को देखते ही मैं मानो मंत्रमुग्द्ध हो गया था...वही इक छोटा सा ख्याल आया जो यहाँ 


पेश-ए-खिदमत किया है)

Monday, February 13, 2012

मुहब्बत

बसंत ऋतु को प्यार का समय माना जाता है ...जब बंजर दिल में भी प्रेम-पुष्प  खिल जाता है ...और प्रकृति भी मानो इसको बढ़ावा देती है ...ऐसा खूबसूरत समां बंधता है कि कोई भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रह पता ....
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मुहब्बत बड़ी हसीन होती है, दिल का चैन चुरा लेती है
याद रहती है एक ही छवि, और खुद को भुला देती है
जितनी कोशिश चाहे कर लो, भूलने न देती है 
ये वो दर्द है, जो चुभती है, पर मज़ा देती है

लगती है हर बात भली, हर अदा सुहानी लगती है
हर पल इक कविता, हर क्षण, नयी कहानी लगती है 
कभी-कभी कौवे सी कर्कश, कभी कोयल की बानी लगती है 
पल में तो बच्ची के जैसी, पल में एक सयानी लगती है 

कहता है इक टूटा आशिक, दर्द बहुत है सीने में
दर्द न हो गर इस जीवन में तो, ख़ाक मज़ा है जीने में
कहता है इक दीवाना कि,  है नशा बहुत कमीने में
नशा न हो गर मदिरा में तो, ख़ाक मज़ा है पीने में
-----------------------------------------------------------विपिन(१४/०२/२०१२)
(आखिरी paragraph कि पहली २ पंक्तियाँ  मेरे पसंदीदा गाने से ली गयी है...थोड़ी सी बदली जरूर हैं पर बात वही है)



Sunday, February 12, 2012

आज चला हूँ मैं

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~आमुख~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
बहुत हुआ अब और नहीं ... जीवन भर जंजीरों में बंधा रहा अब हौसला होता है ...महसूस होता है कुछ कर जाऊँगा ...गर शिखर पर न पंहुचा तब भी कदम जरूर आगे बढ़ाऊंगा...अब लगता है... कुछ कर जाऊँगा ..

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दिल में लिए कितने अरमान चला हूँ मैं, बंधी है मुट्ठी, छूने आसमान चला हूँ मैं
राह में आये लाख मुश्किलें मगर, हर मुश्किल को करने आसान चला हूँ मैं
हौसले से अब मिली है ताकत, दिल में लिए अपना ईमान चला हूँ मैं
मज़बूत हैं इरादे , पंखो में जान है, भरने परवाज़, लगा जी-जान चला हूँ मैं !!

मजबूर था हालातों से मगर, तोड़ने हर बंधन, हर दीवार चला हूँ मैं !
दिखती है जहा तक ज़मीं, क्या अंत है, जानने उस पार चला हूँ मैं !
वक़्त की ताकत कितनी भी हो मगर,हर ढाल पर करते वार चला हूँ मैं!
बावजूद हल पल बुझती लौ के, लिए दिल में उम्मीदे अपार चला हूँ मैं!

अभी बहुत है दूर, मंजिल पाने की आस में बेताब चला हूँ मैं
बिखरे टुकडो से पैदा कर, सच करने हर ख्वाब चला हूँ मैं
पहले भी उठाये हैं कई सवाल, अब लोगो को करने लाज़वाब चला हूँ मैं
कम न होगा साहस इक कतरा, लिए उल्लास बेहिसाब चला हूँ मैं

जिनसे था  मैं डरता अब तक, बनकर उनका काल चला हूँ मैं
जिनसे थी न मिलती आँखे, कर उनपर आँखे लाल चला हूँ मैं
विघ्न विपत्ति आते जो पथ में,उनको ठोकर से टाल चला हूँ मैं
इच्छा तो है हर कुछ पाने की, यूँ ही सपने पाल चला हूँ मैं 


गूंजेगी हर महफ़िल अब सुर से, लेकर सारे साज़ चला हूँ मैं
जिस माता की गरिमा हूँ मैं, करके उस पर नाज़ चला हूँ मैं
मंजिल पाने की नव विधि का , अब करने आगाज़ चला हूँ मैं
बीती बातों को भूला हूँ, लेकर नवोत्कर्ष आज चला हूँ मैं
----------------------------------------------------------------विपिन (१२/०२/२०१२)

(क्रांतिकारी... जो  हर किसी के अंतर्मन में होता है ...किसी भी बात पर झुंझलाता है ...पर बाहर आने से घबराता है ...जब इसमें बाहर आने की शक्ति आ जाती है तो युग परिवर्तन होता है )





Saturday, February 11, 2012

मेरा मन !!

मन, मानव शरीर का सबसे चंचल तत्व है ...किसी मुश्किल से मुश्किल प्रश्न में भी वो जटिलता नहीं होती जो मन में होती है ...और अस्थिरता में तो इसका कोई सानी नहीं है ...इस पल यहाँ तो उस क्षण  कही और ...
इस कविता में जिस अस्थिरता आप अनुभव करेंगे वो इसी मन का दोष है ...मैं तो एक सारथी हूँ जो रथसवार  के आज्ञा के अनुसार ही रथ चलाता है ....

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चंचल सरिता सा बहता मेरा मन, कल-कल छल-छल करता मेरा मन
जाने किस ओर चला है मेरा मन, जाने किसे ढूढ़ रहा है मेरा मन

पल में खुश तो पल में दुखी, पल में  प्रकट तो पल में अन्तरमुखी 
पल में वृक्ष की शीतल छाया, पल में विशाल प्रज्वलित ज्वालामुखी

कभी वीणा के तार सा झंकृत, कभी नन्हे बालक सा पुलकित
कभी नीले आकाश सा विस्तृत, कभी पुष्प-कली सा संकुचित



हल पर दोलन करता मेरा मन, किसी मृग सा कुलांचे भरता मेरा मन
हर पल स्मृति-सागर में गोते लगाता मेरा मन, किसी नाव सा डूबता उतराता मेरा मन 

किसी आहट को सुनकर ठिठक सा जाता है, राह पर चलते-चलते अचानक भटक सा जाता है
लाख बुलाता हूँ मैं उसको वापस, किसी बीती बात पर अटक सा जाता है

किसी के विषय में हल पल सोचा करता है, किसी बात से हल पल थोडा डरता है
जितना ही मैं बाँधा करता हूँ, उतनी उड़ान ये भरता है



आसमान में उड़ता पक्षी मेरा मन, अनंत की ओर अग्रसित मेरा मन
किसी बंधन में विचलित मेरा मन, किसी विचार से हर्षित मेरा मन

मंजिल को ढूढता और भटकता, किसी गली खो जाता है
भूल सभी ये रिश्ते नाते, फिर तन्हा हो जाता है

निद्रा में ये किसी चित्रकार सा, स्वप्न  संरचित  करता है
जागृत होते ही किसी सुनार सा, विचार सुसज्जित करता है

उलझन के भंवर में घूमता मेरा मन, मस्ती की महफ़िल में झूमता मेरा मन
शब्दों की परिभाषा से परे मेरा मन, जज्बातों की लेखनी से परिभाषित मेरा मन

(ये एक प्रयास था मन को समझने का, जैसा की इस कविता से आपने महसूस किया होगा ....मेरा यह प्रयास एक बार फिर असफल ही रहा ...आखिरी पंक्ति इसी भावना को व्यक्त करती है )
  ------------------------------------------------------------------------------------विपिन 


Monday, February 6, 2012

दिल और दिमाग का अंतर्द्वंद्व

दिन भर के काम के बाद थका हुआ मैं, आराम से बिस्तर में लेटा कोई फिल्म देख रहा था। न जाने क्यूँ कोई खटका सा मन में महसूस हो रहा था...मन ही मन एक अंतर्द्वंद्व  चल रहा था ...फिल्म से ध्यान कब हटा पता ही नहीं चला ...
जरा सा ध्यान  दिया तो पता चला ये दिल और दिमाग के बीच की रस्साकसी है.... दिल अपने तर्क दे रहा है और दिमाग अपने ...दोनों काशी से आये हुए किन्ही विद्वानों की भांति शास्त्रार्थ करने में व्यस्त थे ...मेरा मानना था की हम अपने शरीर को अंगों को नियंत्रित करते हैं ... लेकिन ये दो अंग तो स्वचालित यन्त्र  की तरह ... अपने ही निर्णय पर विकासमान थे ... 
मन इन दोनों के बीच दोलन करता हुआ ... किसी राजा की तरह जो विषय से अनिभिज्ञ सिर्फ विद्वानों के तर्क के अनुसार एक को दूसरे से श्रेष्ठ समझता है और अगले ही क्षण दूसरे विद्वान द्वारा दिए गए तर्क से आश्चर्यचकित  होकर उसे श्रेष्ठ समझने लगता है ... 

दिल के द्वारा दिए गए तर्क बहुधा व्यहवारिकता की सीमा से उसी तरह परे होते हैं जैसे किसी निर्धन के लिए महल के सुख साधन ... दूसरी ओर दिमाग के तर्क उसी तरह संतुलित होते हैं जिस तरह किसी तुला के दोनों पलड़े ..

तथापि दिल का दिया एक क्षीण तर्क भी ..दिमाग के सबसे मजबूत दलील को दरकिनार करने की क्षमता रखता हैं ... ज्यादातर जीत दिल की ही होती है .... इसे ईश्वर का चमत्कार कहा जाए या मानव की दुर्बलता ...

लाख कोशिशो के बाद भी दिल, दिमाग पर हावी होता दीख पड़ता था ...और दिमाग युद्ध में घायल किसी महापराक्रमी योद्धा  की भांति प्रघात की प्रबलता को प्रचंड करता जाता था ..

दिमाग द्वारा दिए गए हर तर्क से मन को एक क्षण की शान्ति मिलती थी और सौतिया डाह से ओतप्रोत  दिल अगले ही क्षण उस शान्ति को उसी प्रकार वाष्पीकृत कर देता था जैसे रेगिस्तान में गिरी जल की एक बूँद को तपती हुई रेत.... फिर भी वर्षो से चली आई रीत है कि दिल का कहा कभी झूठ नहीं होता ... परन्तु उसमे व्यावहारिकता नहीं होती ... दिल उसी प्रकार मूढ़ होता है जिस प्रकार चकोर पक्षी जो स्वाति नक्षत्र की चांदनी रात में ओस कि एक बूँद के लिए हर पल टकटकी लगाये चाँद कि ओर देखता रहता है ... मुझे तो यह प्रतीत होता है कि चकोर भी अपने निर्णय दिल से ही लेता होगा ...अगर दिमाग से लेता होता तो यहाँ उसकी उपमा न दी जाती ..

इसी उहापोह में मन विचलित होने लगा...दोनों ही सही प्रतीत होते हैं ...और दोनों ही हितों कि बात करते हैं बस एक बलिदान कि अपेक्षा रखता है तो दूसरा किसी भी परिस्थिति में लाभ के बारे में सोचता है ...

इस विषय पर कुछ लिखना अत्यंत कठिन है ..क्यूंकि दिल और दिमाग के बीच का वार्तालाप किसी भी भाषा कि सीमा से परे है ...दिल और दिमाग एक ही संयुक्त परिवार में रहने वाले उन दो भाइयों के सामान हैं जो न तो साथ रह सकते हैं और न ही अलग हो सकते हैं ..और मन इनके पिता के सामान है जो दोनों के तर्क सुनता तो अवश्य है परन्तु किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ नहीं कह सकता ....

इसी उधेड़बुन में पड़ा हुआ मैं न जाने कब निद्रा के आगोश में समां गया .... और मेरे साथ दिल और दिमाग भी मन का पीछा उसी भांति छोड़ उठे जैसे कोई बालक मिठाई मिलने के बाद माँ को छोड़ उसे खाने में मग्न हो जाता है ...
रात ही है जो मन के लिए उसकी अपनी है यही वो समय है जब मन, स्वप्न की संरचना करता है ...क्यूंकि सुबह होते ही दिल और दिमाग पुनः मन को किसी वृद्ध पिता की तरह अपने अपने तर्क से व्यस्त कर देंगे ....

Thursday, February 2, 2012

होर्डिंग्स से जुडी अर्थहीन बातें

गाडी में बैठा हुआ, बीती यादों के समंदर में गोते लगाता हुआ और रोज़ मर्रा की उधेड़बुन में पड़ा  हुआ कुछ सोच ही रहा था कि, सहसा नज़र जा पड़ी सड़क के किनारे लगे हुए बड़े बड़े Hordings पे, लगभग सभी एक जैसे, सबका सन्देश  एक, पर सन्देश देने वाली! की तस्वीर अलग. सभी किसी न किसी सोसाइटी की प्रशंसा करते हुए और  जीवन की आदर्श परिभाषा समझाते हुए !


अगर आपको अभी तक सन्दर्भ न समझ आया हो तो एक बार पुणे जरूर आईये, वाकड से Ph-२ जाते हुए आप इन होर्डिंग्स को नज़रंदाज़ नहीं कर सकते.

सहसा मन में एक विचार कौंधा, क्या इनकी societies में घर लेने भर से कोई जिंदगी भर की ख़ुशी पा जाएगा ..
लेकिन यहाँ प्रश्न ये नहीं है कि घर लेने से क्या होगा बल्कि ये है कि इन होर्डिंग्स की बदौलत और कुछ भले न होता हो, 6 -7Km का सफ़र तो यूँ ही कट जाता है ...

मानो कोई फिल्म चल रही हो और उसका हर दृश्य पिछले से ज्यादा मनमोहक(ध्यान दें) हो ....

एक होर्डिंग पर लिखा था ..(किसी सोसाइटी का Advertisement था )

Car free roads... care free parents ...

इस बात को पढ़ते ही ख्याल आया ..क्या सोचकर किसी ने ये punch line तैयार किया होगा ..लेकिन अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगती ...इस बात में छुपी नकारात्मकता ने मेरा ध्यान आकर्षित किया ...मैं तो ऐसे जगह पर कभी मकान न लूँ जहा parents को care free होने की बात कही जाए ।

हर एक होर्डिंग में १/२/३ BHK की कीमत लिखी हुई, और एक जीवन सन्देश ...जैसा शायद आसाराम बापू या श्री रवि शंकर भी १०० वर्ष तपस्या करके भी न दे पाए ...

इनके बीच एक होर्डिंग जो इन सबसे अलग होने की वैसी ही कोशिश करता हुआ जैसा हम सब अपनी रोज़ मर्रा की जिंदगी में करते हैं (ज्यादातर असफल रहते हैं ) ...ये कोई और नहीं अमूल का प्रसिद्द होर्डिंग था, रोज़ के न्यूज़ पेपर से headlines  उठाकर इसे कुछ अपने ही तरह के मसखरे, तैयार करते हैं ...पिछले १ साल में मैंने कई बार इसे बदलते देखा है ...हर बार कुछ विश्व या देश स्तर से जुडी बाते होती हैं ...परन्तु इस बार जो देखा वो १ वर्ष में कभी नहीं देखा ...इस बार मुद्दा किसी देश से नहीं सीधे दिल से जुड़ा था ...इस बार का विषय थी चिकनी चमेली ....शायद इस बार अमूल के so called creative मसखरों ने देश विदेश के मुद्दों से हटकर पहली बार उनके दिल की बात कही है ...सोचता हूँ मुन्नी के बारे में भी कुछ अच्छा ही लिखा होगा ...पर मेरी फूटी किस्मत उस समय तो मैं पुणे में था ही नहीं सो उन देवी के दर्शन न कर पाया 

इन्ही होर्डिंग्स के बीच अपनी लाज बचाता एक मंदिर दीख पड़ा ...जिसके  एक तरफ एक होर्डिंग(खूबसूरत लड़की की तस्वीर के साथ, समझ नहीं पाया की advertisement किसका था बिल्डिंग का या उसका !!) और दूसरी तरफ बला की खूबसूरत दूसरी बाला(उसकी भी वही दास्ताँ) ...
इनके बीच अगर कोई मंदिर को प्रणाम करना भूल जाए तो कोई आश्चर्य नहीं ...
मुझे तो खुद कई दिनों बाद उस मंदिर का पता चला ...(वो भी तब जब उन दो होर्डिंग्स में एक वह पर नहीं था )

कुछ यूँ ही गाडी चलती रही और मैं दृश्य दर दृश्य एक टक उन बालाओं और जीवन सन्देश को घूरता रहा (हाँ रूचि का अनुपात जरूर ८०% और २०% का था ) ...

सहसा उस दर्दनाक दृश्य का दर्शन हुआ जिसने ये सिध्द कर दिया की हर फिल्म के अंत में सब कुछ ठीक नहीं होता (शाहरुख़ खान इस ब्लॉग को न ही पढ़े तो बेहतर होगा )
वो दृश्य था मेरी कंपनी की बिल्डिंग :( ...कुछ इस तरह अंत हुआ मेरे खूबसूरत सफ़र  का (जो रोज़ इसी तरह खूबसूरत होती है और अंत में इसी तरह दर्दनाक ...इसी का नाम तो संघर्ष  है )

विशेष टिपण्णी : 
अगर सोचा जाए तो बेकार की बातों में भी कितना अर्थ निकला जा सकता है ...ऐसा ही कुछ यहाँ हुआ है ...

अब से आप सड़क के किनारे की होर्डिंग्स देखे तो उनके आपस में ताल मेल और जीवन सन्देश पर जरूर गौर फरमाए !!

Tuesday, September 6, 2011

जीवन की व्यथा

अकस्मात् बिछुड़ जाते हैं जब अपने, तन्हा दिल जब रोता है,
जीवन की क्षणभंगुरता का, एहसास तभी तो होता है|
हर पल सक्रिय ये शरीर जब, अनंतकाल को सोता है,
हर पल जीवित आत्मा का, मिलन शून्य से होता है|

जीवन की आपा धापी में कहाँ वक़्त मिल पाता है,
मुट्ठी भरी रेत के जैसे, वक़्त फिसलता जाता है|
जितना रोको उतना ही कम,रेत बचा रह पाता है,
यूँ ही गुज़र जाता है जीवन, हाथ कहाँ  कुछ आता है| 


आया है जो इस जग में, एक न एक दिन जाना है,
कोई आगे कोई पीछे, सबका एक ठिकाना है|
जीवन भर तिनका तिनका, जमा करते रह जाना है,
भोर सबेरे प्राण पखेरू, छोड़ बसेरा उड़ जाना है|

भाग्य की विडम्बना तो देखो , कैसे खेल दिखाती है,
पग भर दूर लगती वो मंजिल, और दूर हो जाती है|
दो चार कदम के अंतर पे, अपना रूप दिखाती है,
जितना ही मैं जाऊं उस तक उतना ही इठलाती है|

उस मंजिल को पाने की आस में, सारा जीवन बीत गया,
ताश के पत्तों सा, बना महल ये, वक़्त की आंधी में टूट गया|
छूट गया जो था सब अपना, मृत्यु लहर सब जीत गया,
ज़रा पीछे मुड़कर तो देखो क्या हाथ लगा क्या छूट गया|

ये जीवन कुछ और नहीं, बस इक सुन्दर झांकी है,
पलक उठाकर देखूं तो, बस दो चार कदम ही बाकी हैं|
- विपिन 

(Written on 06-Sep-2011, after death of my Uncle(on 04-Sep-2011). You can observe the intensity of the poetry.)

Sunday, March 20, 2011

Last few days at NITC

This Blog was written when i was about to leave College and Join INFY........... though i was never able to finish it .....i wanted to publish it.....
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what to collect and what to leave i don't know ........ i don't know how to define my days at NITC.... i don't know how to cherish the moment spent in NITC..... yet this little author deep in my heart asking me to write something about Life @NITC...

i thought of writing a blog on this topic earlier but could not be able to do that ......... Honestly saying i write when i feel either very lonely or very happy !!(don't ask me the reason behind this).... here goes my experiment with life @NITC....

I came to NITC with a dream to achieve something which i never had before ....if you ask me now i will say ..YES !! i got what i wanted... reason to come here was not JOB or Degree(these r obvious reasons).... instead i came to see the world beyond my imagination ...people beyond my expectation ... Yes i have got what i wanted to have !!

What about life@NITC ....i want to summarize 3yrs life .... it has not been so long when i came here...i still remember ... The very first day i arrived at NITC Bus stop (the one near Co-ops)... i was searching for Main Gate and by mistake went to the road which lead me to SBI ... then asked someone where is NITC Main gate ... they were looking surprised as if i have asked them about aliens.... they told something i didn't get but thanks to god for creating Symbol language which is almost same all over the world ... anyhow i reached to MB (that too via Main canteen and Admin....not the main gate...i saw main gate next day only !!)... such a beautiful campus ...lot of greenery ...nice weather ... superb hostels ...but everything was not a cakewalk for me...soon Seniors called me in their room... when went their 2-3 people came outside and wished me Good afternoon... i was surprised to have welcome like this ...(later i came to know that they were my classmates and they thought that i m their senior )... Had a tough session their ... thought now i m free... but these sessions continued till September ...initially it was tough to grasp...later adjusted my self to that situation... met many people from various states...with various styles... soon we became good friend to each other and started sitting together and having fun throughout the day ....


Thats all i wrote ......

Sunday, April 18, 2010

और लिख डाला ....!!

यूँ ही कर रहा था बात एक दोस्त से ...था उसको भी शौक शायरी का ...
बातो ही बातो मे , निकल पड़ी इक बात ....और भर डाला एक और पन्ना मेरी डायरी का !!

पता नहीं क्यूँ ऐसे ही हर कविता का आगाज़ होता है ,यूँ ही आ जाती है कोई Situation ...
यूँ ही कुलबुलाने लगता है कीड़ा सा दिमाग मे , और हो जाती है एक नयी Creation ...
यूँ ही हर कुछ हो जाता है ...बस यूँ ही ... चाहूँ भी तो लिख नहीं सकता !!
जब आती है आवाज़ दिल से ..."कि कुछ लिख डाल" ... चाहूँ भी तो रुक नहीं सकता !!

थी कोई, मत पूछो कहा !!.... आशिक मिजाज़ थे हम भी ...बस यूँ ही याद आ गयी उन दिनों की....
बस रखा दिमाग मे ...उस आशिक की एक प्रतिमा ...क्या नाम था उसका ...हाँ !! शायद मनोरमा !!
तो पेश है ....एक मजबूर आशिक के दिल की आवाज़ ...अगर लगे ये आपको अपने दिल के पास तो समझ लेना ... आपकी भी वही दास्तान है ... आखिर बेवफाई, धोखा,नज़रंदाज़ी मिलने के बाद भी उसी से प्यार करना ...इश्क का सम्मान है !!(don't worry मेरे साथ इनमे से कुछ भी नहीं हुआ है !!)


तू न सही तेरी याद को , दिल के पास लगाये बैठे हैं!!
कभी तो मिलेगी ,उस इक झलक कि आस लगाये बैठे हैं!!
गर न भी मिली वो एक झलक , तेरी याद मे तन्हा जी लेंगे!!
गर न भी मिली तू मौत तलक , दर्द-ए-जहर हम पी लेंगे !!
कहते हैं कि उनकी बेवफाई मे, कितने ही दिलों मे आग लगी !!
हम जलते दिल से जग रोशन करने कि साध लगाये बैठे हैं !!


तो ये थी मेरी रचना तारिख--तफरी १६/०४/२०१० !!....

किसी ने की फ़रियाद और लिख डाला ,दिल की सुनी आवाज़ और लिख डाला !!
यादों को दिया शब्दों का रूप , शब्दों ने किया चमत्कार और लिख डाला !!

Wednesday, February 24, 2010

Falling in love with my own writing

How is this possible........how one can fall in love with his own writing....is it not his ego that he is a good writer ?

i must say that i m crazy for my writing .... and i don't know about what is the role of "ego" thing in this. I think that one who do not like his own writing can not write anymore.

ya it may sound crazy but you know what........... i m reading my own blog oftenly.
i have almost read some of my blog even 20-30 times.....yet i feel so attached to them.

while writing a blog i will read that 6-7 times or more depending on whether i'm satisfied or not.........once i will get what i want to put in that ......i will move on to publish that, and this reading again and again thing will go on even after publishing.

There are so many blogs which have not got published becoz i thought they were not good enough.

writing in Hindi is the best thing i can do........with English its not the same !!
i m writing coz i love expressing myself in the way i want ..... which i can't do in direct communication. and most ironic part is that people don't want to listen your crap while you talk. With blog things are different !!.....they read and appreciate your thoughts.......and that feels so great that one can not express in words.

After almost 2 years of Blogging .........when i look back ..... i see what i have achieved ....
you see thoughts are just like Bubbles, at one moment they are there so lively and visible .....after some time they are gone !!
why not Jot them down just like taking a photograph of your bubble !!......and you can read them later........ you don't know what it means to others but it mean a lot to you !!..........you feel so much restful while reading that.......further it boosts your ideas regularly !!



This is the way i Blog !!

Friday, January 1, 2010

There are somethings that Inspire the Soul

Its 4 O'clock in the morning and i don't know why m i writing this blog...cause after last blog ...i wanted to write one more blog on other (similar)topic...but i found myself writing this... ya it may sound crazy ...who will write a blog at this odd time...but believe me ...right now i m out of my mind ...in fact out of this world ..i must say....

If you haven't watched this movie ...."A Beautiful Mind"...then just go and watch this... i just completed the movie ....Its about a mathematical genius and his life ...
The story begins in the early years of Nash's life at Princeton University as he develops his "original idea" that will revolutionize the world of mathematics. Early in the movie, Nash begins developing paranoid schizophrenia and endures delusional episodes..... while painfully watching the loss and burden his condition brings on his wife and friends....and the story goes on.....

All you will see in the movie but the best part according to me was this speech when he got Noble prize in Economic Sciences....

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I've always believed in numbers.
In the equations and logics...
that lead to reason.
But after a lifetime of such pursuits,
I ask,
what truly is logic?
Who decides reason?
My quest has taken me through the physical,
the metaphysical,
the delusional...
and back.
And I have made the most important discovery of my career.
The most important discovery of my life.
It is only in the mysterious equations of love...
that any logical reasons can be found.
I'm only here tonight because of you.
(pointing to his wife)
You are the reason I am.
You are all my reasons.
(best one i guess !!)
Thank you.

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Nice one to watch....this fascinated me a lot .....if you want to have a look at the person himself ...check this ....

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Friday, December 25, 2009

पिछले साल इसी दिन !!

सबसे पहले सभी दोस्तों को Merry Christmas ...
disclaimer :
(ये सिर्फ व्यंग्य है इसका उद्देश्य किसी भी धर्मं या मान्यता के लोगो की भावनाओ का अपमान करना नहीं है )

हाँ तो पाठको , आज तारीख है २५/१२/०९. आज से ठीक एक साल पहले यानी पिछले क्रिसमस के दिन की बात है
...कहानी जरा लम्बी है और सिर्फ निट्ठ्ल्लो को मद्देनज़र रख कर लिखी गयी है...अगर आप अपने को संपूर्ण निट्ठल्ला मानते हैं(जिसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूँ ) तो पढ़िए ....

हुआ यूँ कि पिछले साल २३ दिसम्बर को ही मैं घर से ठंडी की छुट्टियाँ मना कर गया था ...जो कि Admission के - दिन पहले था..उद्देश्य था केरला भ्रमण ...जो कि हुआ नहीं...अलबत्ता सारे पैसे जरूर खाने मे ख़त्म हो गए थे ...Mess बंद होने के कारण ..खाने का कोई ठिकाना था ..कभी Main Canteen मे खा लिया कभी Kattangal मे ...कहीं भी खाना तो सही मिलता ...हाँ पैसे जरूर जेब का साथ छोड़ देते थे ...कुल मिलकर पूरे बंजारों सी जिंदगी काट रहे थे ...

उन्ही उबाऊ दिनों मे एक SMS आया जिसका मजमून मानो प्यासे को पानी के समान था...नहीं नहीं ऐसा कोई खजाने का नक्शा था ...सिर्फ Open Invitation यानी खुला बुलावा था ... Christmas Celebration के लिए
हमने भी शेखचिल्ली महाशय कि तरह , अच्चा ख़ासा हवाई महल बना लिया ...सोचा अच्छा मौका है कुछ कुछ खाने को तो जरूर मिलेगा ...चलते हैं...इसी बहाने दूसरे धर्मो को समझने और दूसरी संस्कृति का अध्ययन करने का उद्देश्य मतलब "एक तीर से तीन निशाना" का पूरा पालन हो जाएगा तो यूँ हम निकल पड़े मानव जाति का उद्धार करने ...मानो सारा विश्व हमारी ही ओर टकटकी लगाये देख रहा हो , सारे बुद्धिजीवी हमारी ही ओर आशा भरी नजरो से देख रहे हों ...कि लो वो जा रहे हैं इस युग के कार्ल मार्क्स ...पर ये तो सिर्फ आपके और हमारे बीच मे है कि इस सब के पीछे ये पापी पेट ही था ....बड़े बड़े नेता ,अभिनेता ,पुलिस सभी पापी पेट के लिए क्या क्या करते हैं ये तो किसी से छुपा नहीं है ...

हम बेसब्री से इंतज़ार करने के बाद निर्धारित समय पर सुबह १०:०० बजे पहुच गए निर्धारित जगह पर ...देखा तो वीरान सा पड़ा हुआ है सब कुछ ...मानो यहाँ तो कई सालों से कुछ आयोजित हुआ है और न ही कई युगों तक होगा ... हाँ सत्य तो यही था कि कुछ अच्छा मिलने के लालचवास हम समय से पहले ही वह पहुच गए थे ....अब आ गए तो वापस जाने का तो सवाल ही नहीं उठता ...युद्ध मे गया वीर बिना लड़े कैसे आ सकता है...कमान से निकला तीर लक्ष्य तो बेधेगा ही ...उसी तर्ज़ मे हम भी डटे रहे इस उम्मीद मे कि इंतज़ार का फल मीठा होता है (कही सुना है पर वो फल हर बार मिले ऐसा जरूरी नहीं है )...कुछ ही समय मे कुछ अजीब से दिखने वाले प्राणी जिन्हें आप पता नहीं क्या लेकिन हम तो मटके(अगर आप नहीं जानते तो तुरंत संपर्क करें) बोलते हैं , आ पहुंचे ...और हमने भी प्रवेश किया उस कमरेनुमा मीटिंग रूम मे (हाँ हाँ पता है मीटिंग रूम तो कमरेनुमा ही होगा न !! )...

अब मुझे तो ईसाई धर्म के रीति रिवाज़ तो मालूम नहीं थे ..सो अपनी तरफ से पूरी सावधानी बरती जा रही थी ....फिर भी दूसरो को शीघ्र ही पता चल गया कि हम Alien हैं (कम से कम उनसे तो नहीं मिलते हैं )...वो एक बहुत ही छोटा सा कमरा था ..कुछ कुर्सियां पड़ी हुई थी जिन पर १०-१२ लोग बैठे हुए थे ...हमने सुरक्षा के मद्देनज़र ...सबको चीरते हुए सबसे पीछे कि सीट धर ली ...ताकि वहा से दूसरों को देखकर नक़ल तो कर सकें ...जल्द ही प्रार्थना शुरू हुई सभी लोग सम्मान मे उठ खड़े हुए (हो सकता है कुछ की श्रद्धा रही हो )...हमने भी तुरंत नक़ल की..उसी समय अपने निर्णय क्षमता पर पूरा गर्व कर ही रहा था कि ...ये क्या ...प्रार्थना तेलुगु मे ..कुछ मल्लू अनुयायी जिन्होंने ने कुछ महत्त्वपूर्ण कामो को छोड़कर यहाँ शिरकत कि थी ,जल्द ही निराश नज़र आये और चलते बने ...पर हम तो पूरा संकल्प कर के आये थे कि चाहे जो भी आज धर्म और संस्कृति का अध्धययन करके इस दुनिया से परायण करने से पहले मानव जाति का कुछ तो उद्धार करके ही जायेंगे ...शीघ्र ही प्रार्थना समाप्त हुई ...अब हम लालायित नज़रो से देखने लगे ....मन मे जिज्ञासा थी कि अब क्या...साथ ही ये उम्मीद भी थी कि क्या पता यही कार्यक्रमकी समाप्ति हो जाए और अच्छा अच्छा खाने को मिले ...पर ईश्वर इतना भी दयालु नहीं है ...और फिर युगों से चली आ रही उक्ति "समय से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को नहीं मिलता " को भी तो यथार्थ करना था ...

.बहुत समय बाद अंग्रेजी के कुछ शब्द कानो मे पड़े तो एक क्षण को तो ऐसा लगा मानो स्वयं ब्रह्मा ने आकर बीजमंत्र फूंक दिया हो ...जल्द ही बंगलोर से ख़ास उस दिन के लिए बुलाये गए ,दूसरे शब्दों मे Chief Guest ,सामने आये वे Brother थे और जैसा कि काफी लोगो को लगे ...हमारे लिए भी उनका आगमन कुछ रोमांचक न था ...अपने पद के अनुरूप उनने Bible के कुछ उक्तियों से शुरुआत की ..उनकी बाते ज्ञान से परिपूर्ण लेकिन नीरस थी (ये तो ब्रह्म सत्य है )...कुछ समय को तो लगा की उनकी बातों से कुछ points अपने जीवन डाले जाए ...लेकिन शीघ्र ही पेट ने दिमाग पर भारी होना शुरू कर दिया ..वो भाषण था या "तिलिस्माये होशरुबा "(जो नहीं जानते नीचे का note पढ़ लें ) की किताब जो ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था ...३० मिनट बीते १ घंटा बीता १:३० घंटा ....अब नहीं रहा जाता ..."भाड़ मे जाए मनुष्य जाति और तेरा पावन उद्देश्य " मन ने कहा ..आज तो बच्चू बहुत बुरे फंसे ..न भाग सकते हैं और न रुक सकते हैं ...भागने का मतलब धर्मं का अपमान होगा और रुकने का मतलब अपने पेट के आदेश का अपमान ...इसी पेट और धर्म के युद्ध मे उलझा मैं कुछ और देर तक बैठा रहा और ..जब ऊपर वाले से इस गरीब की स्थिति न देखी गयी तो उसने कृपा दृष्टि घुमाई ...और शायद उन्ही के कारण श्रीमान Brother जी ने अपना व्याख्यान ख़त्म किया और मेरा रोम रोम पुलकित हो उठा ...

अब वो क्षण आ चुका था जिसके लिए मैंने वहां की यातनाए झेली और आपने यहाँ की (मतलब आपने ये पूरा लेख पढ़ा )

जल्द ही स्वयं सेवक कुछ खाने का लाये ...मन मे उमंग और साँसों मे तरंग छाने लगी ....लेकिन ये क्या ये तो सिर्फ एक प्लेट है ...जिसमे सूक्ष्म निरिक्षण से पता चला की उसमे एक केक का टुकड़ा और नमकीन था ..."बस इतना ही" ..मन ने कहा ...दिमाग ने जो कि अपेक्षाकृत ज्यादा चालाक होता है ,इसका विरोध किया और "संतोषम परमम् सुखं " की उक्ति का पालन करने का सलाह दिया ...अब बस एक मात्र आशा थी कि शायद ये नाश्ता हो और खाने का कार्यक्रम इसके बाद हो ...जो भी हो अब जो मिला खाना ही था .उसके बाद Pineapple जूस दिया गया ..और फिर सभी उठकर बाहर जाने लगे हमने भी सोचा हो सकता है भोजन के लिए जा रहे हो ,उनके पीछे हो लिए ..लेकिन ये तो बाहर का रास्ता है जहा मुंह धोने के लिए पानी drum मे रखा हुआ था....मतलब मुंह धोकर चलते बनो ...क्या ख़ाक मुंह धोएं ..कुछ खिलाओ तो सही ...लेकिन वह कौन सुनता है ..चीखते रहो चिल्लाते रहो ...आखिर हताश होकर हमें भी निकलना ही पड़ा ...क्यूँकि अब वहा कुत्तों का राज़ होने वाला था (जैसा की हर शादी की पार्टी के बाद होताहै )...जिन्हें अपने जैसे दिखने वालों से नफ़रत होती है ...

तो यूँ अपना सा मुंह लेकर हम Main Canteen आये और वही खाना खाया जिससे मुंह मोड़कर गए थे ...."लौट के बुद्धू घर को आये " मुहावरा सटीक बैठता मालूम हुआ ...!!

कहानी से शिक्षा : लालच बुरी बला !!

नोट:"तिलिस्माये होशरुबा " २५०० पन्नो कि २७ जिल्दों(parts) वाली किताब है और संभवतः विश्व कि सबसे वृहद् रचना है !!

Friday, December 11, 2009

एक कविता मेरे Collection से

ये कविता मैंने ... 01/10/06 को मेरे एक अच्छे दोस्त से झगडा होने के बाद लिखा था .... आज सोचता हूँ तो लगता है वो झगडा ....अच्छा था जो हुआ ....वरना ये कविता कैसे जन्म लेती :P ...सोचा था की इससे blog मे न डाला जाए ...लेकिन फिर सोचा तो लगा क्यूँ न दूसरो को भी इस कविता के माध्यम से कुछ message दे दिया जाए...ये मेरा नजरिया है जिंदगी के लिए ...हाँ लेकिन सावधान !! इसे हरगिज़ भी -ve sense मे न लिया जाए आप मे से कई लोग इससे सहमत न हो लेकिन यही सत्य है ....हाँ प्यार और साथी अपनी जगह तो हैं ही !! ;) .... अब आपका ज्यादा वक्त न लेते हुए ...मैं अलविदा लेता हूँ...और छोड़ जाता हूँ ...आपको कुछ मार्मिक पंक्तियों के बीच ...पढ़िए और पसंद आए तो comment जरूर दीजिये .... आख़िर एक Blogger और एक कवि क्या चाहता है ...
थोड़ा सा Appreciation बस !!.....

इस पार खड़ा मैं जीवन तट पर , पाता खुद को एकाकी |
है कोई नहीं जो बन पाए , सुख जाम पिलाने को साकी |
यूँ तो दिखाती चंचल लहरें , चंचल हर पल जीवन नौका |
हर ओरे हिलोरे खाती नौका , आधार नहीं इस जीवन का |
मंदगति से बहती वायु , आभास दिलाती इक साथी का |
हैं सत्य बताते रेत के कड़, सत्य दिखाते इस जीवन का |
है कोई नहीं जो दिखला दे , क्या रह चलेगी यह नौका |
कोई नहीं है जो ला दे , अन्धकार मे प्रकाश सुख दीपक का |

लहरों कि इन बाधाओ को , पार तुझे ही करना है |
जब भी आये व्यवधान मार्ग मे , पतवार तुझे ही भरना है |
जब आया जग मे एकाकी , एकाकी ही मरना है |
जर्जर होती इस नौका का हर छिद्र तुझे ही भरना है |
पाना है मंजिल तुझको , भवसागर को तरना है |

सत्य जानकार भी तू क्यूँ , इस भ्रमजाल मे फंसा हुआ |
है साथ नहीं कोई फिर भी , किस मोहजाल मे कसा हुआ |

मृगमारिचिका बन कोई , अपने पास बुलाता है |
दो पल साथ निभाकर वो , फिर गायब हो जाता है |
फिर हो जाता एकाकी , दुःख का बदल घिर जाता है |
है खड़ा सामने अपार समुद्र , फिर भी तट पर एकाकी पाता है |
------------------------------एक नवोदित कवि (मैं और कौन ;) )

Saturday, September 5, 2009

Munnar once again...yet memorable

after one year long gap here comes my first blog........

Last Tuesday was Second time that i was in Munnar.
Munnar is a hill station situated at Nilgiri hills at MSL 1600 meters and is at the border of Tamilnadu and Kerala,full of Tea-gardens and eye catching natural scenery .Ideal place to visit in your leisure time like summer vacations.We too got chance in Onam vacation.

we started on monday evening on 31st Aug having all kind of variety (you know what i mean) in our group(group of 11+1 people with 3 girls and 8 boys) we moved to Munnar....after taking dinner in Rajyasthan bhojnalya at calicut(awesome food !!) , we were ready to rock !!.
started of playing cards at the backseat of SUMO. we moved towards Thrissur (our first stay)...by midnight or so we reached to Chetta's home ..it was too funny to see that we 12 people were entering to his house at 12:30...whole place was silent as dead..not a single creature was awaken ...everyone was sleeping and we came without a noise ...everybody was whispering to each other hence creating a lot of whispered noise (new term for me) .Chetta in his life first time was awaken till that night...of course for us only.(Thank you Chettuwa !!
)
we started searching for something to eat.......4-5 people entered his kitchen and then nothing to write about what happened there(you can guess!!).We planned to leave at 4 O'clock so we went to roof and started playing cards....but God wanted us to sleep thus rain came and we had to come down and sleep ...nobody got sleep....and at 5 O'clock after taking Chetta's tea (chetta made for us :)) and taking blessings of Mummy & Papa(Chetta's parents)..we left for Munnar....

on the way we saw some good scenery and had small photo sessions...when Munnar was just 50 km away ....some of us started feeling vomiting possibly due to because we were climbing the hill and roads were very much curly...hence we moved slowly ...anyway somehow we reached to Munnar and had some pills to stop vomiting.

Had lunch at Marwadi Restaurant ...i was wondering to see the change ....everyone was eating like they hadn't got food for years... these were the people who were vomiting an hour back...God "Teri leela tu hi jaane"......


first place was Mattupetty Dam... like all other dam nothing more was there...but scenery around this dam was making it special for tourists....we had some creative photography ...some shooting(of course on ballons !!)...and some Rain !!.... we moved shortly to next place...

next was Echo point .... as name suggests it was echoing whatever you screamed....what more we needed ....it was ideal place for Chichoras...(like us)...we started screaming all the keywords one by one...sometimes those hills around the river from which echo was coming back ...were so confused about what to return as echo !!...this was example of Heavy load situation(now i got why these faculties @ NITC are teaching us those things)....

next was Kundala Dam...another dam but ideal place for boating...costly though ...we made three teams and started boating while some people liked to have a sleep in vehicle itself hence they didn't come for boating ...luckily i got good team and i was captain (jack sparrow)[i was handling the lever
]...(but some people were not that lucky)...

then we moved to last destination which was Top Station...standing tall at Tamilnadu-Kerala border ...nice mixture of high peaks and plain fields..red soil with greenery was making whole view full of colours ...i was expecting that place to be fully covered by cloud (on my last visit it was so !!) ...but unfortunately we didn't get any cloud nereby... indeed wind was blowing to fast that time temperature was apprx 12oC it was too cold there.....but who cares for these things when your mind is busy watching some of the marvellous creation of Almighty...this was perfect place for me as i could take so many photos and observe the design to boost my ideas......

while coming back we got our wish fulfilled ...clouds were covering all the place and we were moving across the cloud ...the cloud which since our childhood we dreamt to touch...whom stories brought us sleep many times(those king and queen stories)...which after 10 years of age(when we are supposed to become grown one ...ironically ) was unimaginable to even think of touching it ...that cloud ....yes we were moving through that cloud !!........

we wished to go to Athirapally but some problem occured hence ....
nevertheless we may go for that any time ...this was my experience with Munnar trip....... will be writing on ......

Saturday, September 27, 2008

Work work and work...

Now a days we people are under so much of work pressure,

may be this is prior training to face the Industry work pressure and we people here in NITC
are getting same atmosphere here.If you are in some institute of BIG name then your are supposed to follow the standered of institution.
we are trying to do same thing.Even i am not getting time for my fav things.
which i want to do,but this kind of hectic schedule is having some positive things also.Once you are in this kind of system ,After sometime you will start enjoying this kind of lifestyle.For us "The Software professionals" this is not a new thing and we people are supposed to work like JACK.

So thank god you send me in this field where we are aware of latest technology and are at the fore-front of latest era.But if i want this i know i have to pay a lot for this ,and this is what that giving me stength.
So now i have to go back to that" Hardwork "...........

Wednesday, August 27, 2008

what am i thinking right now ??

Right now there is only one thing in my mind and that is "is this a correct educational system that we are having in India.

ya you might be thinking that this person is blaming our educational system
but in my point of view i am not blaming instead i am thinking of a new way.......

we can easily see that there is a child who want to try something else or who want to study something else but our edu. system is too strict.So that since his childhood we will divert his mind and his independent thinking will be ruined . When human is a child he want to try something out of the track but after sometime when he will see this trend of education where mugging things matters he will adopt himself according to this system and that is where innovation dies.

take example of Einstein and Thomas Edison by there life we can see they were thinking beyond society's point of view and they made that very society to follow their view.

what my idea behind all these is student should get time to do some innovative and creative things. The curriculum should not focus on remembering things instead of that it should be designed such that student should have room for their own ,natural thinking. Whenever some students are doing something beyond the trend ,it should be encouraged in such a way that he should feel the importance of innovation.

may be all student will not accelerate in this kind of edu. system but those who can do some creativity they should get chance at least........

Thursday, August 21, 2008

My first poetry on this Blog

चलो भाई अब कुछ कविता भी हो जाए
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गुजरते हुए इस पल की बाद यादे शेष है,
बिखरते हुए इस कल की बातें विशेष है |
आँखे भी न खोल पाया था मैं कि वक्त गुजर गया,
इक लफ्ज भी न बोल पाया था मैं कि नशा उतर गया |
अभी तो खड़ा था इस किनारे अब उस पार उतर गया ,
देखते ही देखते इस मंझधार को मैं पार कर गया |
सोचता हूँ ये मंजिल कभी तो पास होगी जो दूर ही रही ,
सोचता हूँ जीने की कोई आस होगी जो मजबूर ही रही |
बस यादों के इस भवंर मे मैं घूमता ही रहा ,
बस मंजिल को इस कदर मैं ढूद्ता ही रहा |
काश ! वो पल वो लम्हे लौटकर आ जाए जिनका इंतजार है ,
गुजरते हुए इस पल की याद मे दिल बेकरार है |
जब मंजिल हो मेरे सामने फैलाये अपनी बांहें,
जब दिल भरा हो प्यार से ,आंसू भरी हो आँहे |
सोचता हूँ उस ममताभरी मंजिल का कोई तो आकार होगा ,
सोचता हूँ उस गुजरते पल का कोई तो तार होगा |
सोचता हूँ यादों का मौसम कभी तो खुशगवार होगा ,
सोचता हूँ मंजिल पाने का सपना कभी तो साकार होगा ||
- विपिन सिंह
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(I wrote this poetry on 05-03-2006 at that time i was feeling too much alone and that feeling came out from my pen instead of tears . After writing this poetry i recited this first to my sister as she was impressed by language and structure of poetry ,she appreciated me.since those days i was new poet so i was just writing my poetries and wasn't telling to anyone by my sis appreciation i got courage to recite all poetries of mine to others and thats why i am writing this on this blog.)